अनंत चतुर्दशी का पर्व बहुत ही सम्माननीय माना गया है, क्योंकि यह भगवान श्री विष्णु के प्रति उनकी महिमा और भक्तों की श्रद्धा का प्रतीक है। यह पर्व गणेश उत्सव के तुरंत बाद आता है और उसी के समापन का भी प्रतीक होता है। इस दिन गणेश विसर्जन किया जाता है।इस वर्ष की अनंत चतुर्दशी विशेष महत्व रखती है। यह न केवल भगवान विष्णु की आराधना का पावन अवसर है, बल्कि गणेश उत्सव के समापन के साथ भक्तों के जीवन में नए उत्साह और सकारात्मकता का संदेश भी देती है।
भगवान विष्णु और अनंत चतुर्दशी का महत्व
अनंत चतुर्दशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करने से जीवन में अनंत सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।यह पर्व भक्तों की श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। अनंत” का अर्थ है जिसका कोई अंत न हो। भगवान विष्णु को अनंत स्वरूप में पूजा जाता है और इस दिन अनंत सूत्र धारण किया जाता है, जो उनकी कृपा और संरक्षण का प्रतीक है।
आइए जानते हैं अनंत चतुर्दशी कब शुरू होगी
हिंदू पंचांग के अनुसार अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
वर्ष 2025 में यह तिथि 6 सितंबर की देर रात 3 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी।इसका समापन 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए इस साल 06 सितंबर को अनंत चतुर्दशी मनाई जाएगी।
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अनंत चतुर्दशी की सही पूजा विधि
1. सबसे पहले प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. स्नान के बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत (उपवास) रखने का संकल्प लें।
3. एक वेदी (चौकी) पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और पास में जल से भरा कलश रखें।
4. भगवान विष्णु की पूजा विधिवत करें उन्हें पीले फूल, चंदन, अक्षत (चावल), धूप और दीप अर्पित करें।
5. इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें।
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अनंत चतुर्दशी पूजन मंत्र
ॐ नमो ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं क्लीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी मम गृहे धनं देही चिन्तां दूरं करोति स्वाहा ॥
ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अनंत चतुर्दशी का इतिहास
अनंत चतुर्दशी व्रत से अनेक कथाएँ जुड़ी हुई हैं, लेकिन मुख्य रूप से इनका संबंध महाभारत से बताया जाता है। इनमें दो प्रमुख प्रसंग उल्लेखनीय हैं—
1. युधिष्ठिर और पांडवों का प्रसंग
जब पांडव वनवास के दौरान कठिनाइयों से जूझ रहे थे और राज्य वापस पाने का कोई उपाय नहीं दिख रहा था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत भगवान के व्रत का ज्ञान दिया। पांडवों ने श्रद्धा से यह व्रत किया और उनके संकट दूर हुए। इसके परिणामस्वरूप उन्हें पुनः विजय और राज्य की प्राप्ति हुई।
2. अनंत डोर के अपमान की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, एक ऋषि ने अनंत डोर का अपमान कर दिया। इसके कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाद में प्रायश्चित करके और अनंत चतुर्दशी व्रत का पालन करके उन्होंने अपने सभी कष्टों से मुक्ति पाई।
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भगवान श्रीकृष्ण ने सलाह दी, पांडवों ने पूछा।
जब पांडव अपना सब कुछ हारकर वनवास में कठिन कष्ट झेल रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने गए। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से अपने दुखों का कारण पूछा और समाधान जानना चाहा।भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि यदि वे भगवान अनंत की पूजा और व्रत करेंगे तो उनके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त हो जाएगा।